कबीर दास-तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय-

Started by Atul Kaviraje, November 01, 2025, 11:01:13 AM

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Atul Kaviraje

कबीर दास जी के दोहे-

तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय॥२॥

१. प्रारंभ: निंदा का त्याग

यह जीव कहता है जग में,
तुम किसी को तुच्छ न माना कभी।
किसी को क्षुल्लक देखकर,
निंदा कभी न करो कभी भी!

कबीर कहते हैं वचन,
रखो समता का ध्यान सदा।
अहंकार का बोझ,
करता है भक्ति को बाधा कदा!

अर्थ: कबीर कहते हैं कि इस संसार में किसी को भी छोटा मत समझो और किसी को भी क्षुल्लक देखकर उसकी निंदा (अपमान) कभी मत करो। हमेशा समानता का भाव रखो, क्योंकि अहंकार का बोझ भक्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है।

२. पैर के नीचे का तिनका

घास की वह तिनका,
जो पैरों के नीचे पड़े सदा।
उसे पैरों तले मत रौंदो,
न दिखाओ क्रोध उसको कदा!

जो वस्तु है दुर्बल,
आज तुम्हारे अधिकार में हो भले।
उसका सम्मान रखो,
देता है कबीर यह सीख हर पल मिले!

अर्थ: घास की वह काडी, जो हमेशा आपके पैरों के नीचे दबी रहती है, उसे पैरों से मत कुचलो और उस पर क्रोध मत दिखाओ। जो वस्तु आज आपके सामर्थ्य के कारण दुर्बल है, उसका आदर करो। कबीर हमेशा यही सीख देते हैं।

३. परिणाम और पीड़ा

वही तिनका उड़कर,
आँखों को चुभे जब भी कभी।
होती पीड़ा घनेरी,
सहन न होती वह व्यथा तभी!

आँसू बहने लगते,
आँखें होती लाल भरी सारी।
एक क्षुल्लक सी चीज से,
कितनी तकलीफ आती भी!

अर्थ: वही घास की काडी जब अचानक उड़कर आँखों में चली जाती है, तो बहुत अधिक पीड़ा होती है और वह दर्द सहना मुश्किल हो जाता है। आँखों से आँसू बहने लगते हैं और आँखें लाल हो जाती हैं। एक क्षुल्लक सी चीज से कितनी बड़ी तकलीफ उठानी पड़ती है।

४. अहंकार का फल

अहंकार से जो
छोटा देखे, दुर्बल मानव को सदा।
न्याय का नियम कहता है,
कर्मफल से मिले बाधा कदा!

आज जो पैर के नीचे,
वही कल आँखों पर आए।
छोटी सी शत्रुता की पीड़ा,
मानव को तड़पाए फिर जाए!

अर्थ: जो मनुष्य अहंकार के वश होकर दुर्बल लोगों को तुच्छ समझता है, उसे न्याय का नियम (कर्मफल) कभी न कभी कष्ट देता है। आज जो पैर के नीचे है, वही कल आँखों पर संकट बनकर आता है। उस छोटे से शत्रु की पीड़ा मनुष्य को तड़पाती है।

५. सामाजिक समता

यह दोहा सिखाता है,
सामाजिक समता की बात सच्ची।
भेदभाव मन में न रखें,
जाति पाँति का कच्ची बात यह सभी की!

हर जीव में बसता है,
वही राम और हरी एक समान।
तिनका और राजा,
दोनों हैं उसी ईश्वर के रूप महान!

अर्थ: यह दोहा सामाजिक समता की सच्ची बात सिखाता है। हमें मन में जाति-पाँति का कच्चा भेदभाव नहीं रखना चाहिए। हर जीव में वही राम और हरि वास करते हैं। तिनका और राजा, दोनों ही उस परमेश्वर के सच्चे रूप हैं।

६. भक्ति और विनम्रता

भक्ति का मार्ग कठिन है,
जिसे विनम्रता का साथ न मिले गर।
विनम्र होकर सीखो,
लो सबका हाथ मिलकर फिर बढ़ो आगे!

जिस जीव को हम नहीं मानेंगे
तुच्छ, ईश्वर मिले तभी तो बस है यह सच!
कबीर माँगे बुद्धि,
पैरों तले की काडी को सम्मान दो तुम बस!

अर्थ: जिसे विनम्रता का साथ नहीं, उसके लिए भक्ति का मार्ग कठिन है। विनम्र होकर सीखो और सबका साथ लो। जिस जीव को हम तुच्छ मानते हैं, उस परमेश्वर की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। कबीर प्रार्थना करते हैं कि, पैरों के नीचे की काडी को भी आदर दो।

७. निष्कर्ष: आत्मज्ञान

तिनके के रूप में,
ज्ञान दिया कबीर ने यह सच्चा जो हरदम रहा।
मनुष्य दे जब दुःख,
तब जीना तुमको शांत ही होकर सदा!

इस दोहे को मन में रखकर,
करो अहंकार का नाश तुम बस भी!
विट्ठल के नाम में,
होगा फिर आत्मज्ञान का प्रकाश तभी!

अर्थ: घास की काडी के रूप में कबीर ने यह सच्चा ज्ञान दिया है। जब मनुष्य आपको कष्ट देता है, तब आपको शांत रहना चाहिए। इस दोहे को मन में रखकर हम अहंकार का नाश करें। तभी विट्ठल के नामस्मरण में आत्मज्ञान का प्रकाश होगा।

--अतुल परब
--दिनांक-31.10.2025-शुक्रवार.
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