कबीर दास-बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार॥५॥-1-

Started by Atul Kaviraje, November 04, 2025, 11:37:32 AM

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Atul Kaviraje

कबीर दास जी के दोहे-

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार॥५॥

1. पहला चरण: बलिदान पर बलिदान 🙏

गुरुराज, आप मेरे हैं, 🙇 मैं बलिदानी बन गया हूँ, मैंने यह जीवन आपके चरणों में, प्रति घंटा, अर्पित किया है। हर साँस के साथ, मैं सौ बार प्रणाम करता हूँ, आपकी अखंड भक्ति से, मैं आपको प्रतिदिन अर्पित करता हूँ।

(प्रत्येक पद का मराठी अर्थ):

गुरुराज, आप मेरे हैं, मैं बलिदानी बन गया हूँ: हे गुरुराज! आप ही मेरे सर्वस्व हैं, मैं आपको पूर्णतः समर्पित हूँ।

आपके चरणों में, मैंने यह जीवन आपके चरणों में, प्रति घंटा, अर्पित किया है: मैंने अपना यह जीवन आपके चरणों में, प्रति क्षण, समर्पित किया है।

हर साँस के साथ, मैं सौ बार प्रणाम करता हूँ: हर साँस के साथ, मैं आपको सैकड़ों बार, अनगिनत बार प्रणाम करता हूँ।

आपकी अखंड भक्ति से, मैं आपको प्रतिदिन अर्पित करता हूँ: मेरी भक्ति अखंड है, मैं स्वयं को आपको प्रतिदिन अर्पित करता हूँ।

2. दूसरा चरण: मनुष्य का स्वभाव 👤

मैं एक साधारण मनुष्य था, अज्ञान का अंधकार, मोह-माया में लिप्त, संसार का बोझ। काम-क्रोध, लोभ-मोह, हृदय का घर था, गुरु के बिना, कोई मूल्य नहीं था, मैं एक भटकता हुआ मनुष्य था।

(प्रत्येक श्लोक का मराठी अर्थ):

मैं एक साधारण मनुष्य था, अज्ञान का अंधकार: मैं एक साधारण मनुष्य था, जिसका जीवन अज्ञान और अंधकार से भरा था।

भ्रम-माया में लिप्त, संसार का बोझ: मैं इस संसार (संसार) के मोह में फँसा हुआ था और मुझे इसका बोझ महसूस हो रहा था।

काम-क्रोध, लोभ-मोह, हृदय का घर था: मेरा हृदय काम, क्रोध, लोभ और मोह के विकारों से भरा हुआ था।

गुरु के बिना, कोई मूल्य नहीं था, मैं एक भटकता हुआ मनुष्य था: गुरु के बिना, मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं था, मैं बस एक भटकती हुई आत्मा थी।

3. तीसरा चरण: दिव्यता प्राप्त हुई ✨

आपके ज्ञान के स्पर्श से, मैं दिव्य रूप बन गया, मैंने अंधकार को दूर किया, मैंने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया। मैं आत्मा-परमात्मा का प्रेमी बन गया, मैं एक साधारण मनुष्य बन गया, मैं एक महापुरुष बन गया।

(प्रत्येक श्लोक का मराठी अर्थ):

आपके ज्ञान के स्पर्श से, मैं दिव्य रूप बन गया: आपके ज्ञान के स्पर्श के बाद, मेरा साधारण रूप दिव्यता में परिवर्तित हो गया।

मैं अंधकार का प्रेमी बन गया, मैं एक सच्चा मनुष्य बन गया: आपने मेरे जीवन से अज्ञानता को दूर किया और मुझे मेरा सच्चा आध्यात्मिक रूप दिखाया।

मैं आत्मा-परमात्मा का प्रेमी बन गया, मैं एक साधारण मनुष्य बन गया: आपने मेरे मन में आत्मा और परमात्मा के मिलन की इच्छा जगाई।

मैं एक साधारण मनुष्य बन गया, मैं एक महापुरुष बन गया: आपने एक साधारण मनुष्य को महान (बुद्धिमान) बनाया, आपने यह महान कीमिया की।

4. चौथा चरण: तत्काल कृपा ⚡

आपकी यह कृपा, बिना दो बार किए, एक क्षण में ही भवसागर का किनारा हटा देती है। अज्ञान का जाल टूट गया, विवेक जागृत हो गया, आपकी दृष्टि के तेज से, जीवन तत्काल शुद्ध हो गया।

(प्रत्येक श्लोक का मराठी अर्थ):

आपकी यह कृपा, करने में एक क्षण भी नहीं लगा: आपकी कृपा से, यह महान कार्य संपन्न हुआ, एक क्षण का भी विलंब नहीं हुआ।

एक क्षण में ही भवसागर का किनारा हट गया: आपने मुझे क्षण भर में संसार के बंधन से मुक्त कर दिया।

अज्ञान का जाल टूट गया, विवेक जागृत हो गया: मेरे मन का अज्ञान का जाल टूट गया और मेरा विवेक (बुद्धि) जागृत हो गया।

आपकी दृष्टि के तेज से, जीवन तत्काल शुद्ध हो गया: आपकी कृपा दृष्टि की शक्ति से, मेरा जीवन तत्काल शुद्ध और पवित्र हो गया।

5. पाँचवाँ चरण: कबीर का आनंद 💖

गुरु की कृपा का यह अनुभव, शब्दों से परे, इतना विशिष्ट है, इसीलिए कबीर गाते हैं, गुरु की महिमा का उत्साह। आपने ही सच्चा ज्ञान दिया, आपने ही प्रेम दिया, जीवन में गुरु की कृपा का यही सुंदर नाम है।

(प्रत्येक पद का मराठी अर्थ):

गुरु की कृपा का यह अनुभव, शब्दों से परे है: गुरु की कृपा का यह अनुभव शब्दों से परे है, यह अत्यंत विशिष्ट है।

इसलिए कबीर गाते हैं, गुरु की महिमा का उत्साह: इसीलिए कबीर दास हमेशा गुरु की महानता का गुणगान करते हैं।

आपने मुझे सच्चा ज्ञान दिया, आपने मुझे प्रेम दिया: आपने मुझे सच्चा ज्ञान और दिव्य प्रेम दिया।

जीवन में गुरु की कृपा, यही एक सुंदर नियम है: जीवन में गुरु की कृपा प्राप्त करना, यही सबसे सुंदर नियम है।

--अतुल परब
--दिनांक-03.11.2025-सोमवार.
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