कबीर दास-बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार॥५॥-2-

Started by Atul Kaviraje, November 04, 2025, 11:38:06 AM

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Atul Kaviraje

कबीर दास जी के दोहे-

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार॥५॥

6. छठा चरण: गुरु की उपमा 🌞

गुरु ज्ञान का सूर्य है, ☀️ शिष्य की वह बाती, गुरु का प्रकाश, जीवन का भोर। गुरु वही पारसमणि है, शिष्य का सोना, कबीर गुरु की महिमा गाते हैं, यही भक्ति की सच्ची हवा है।

(प्रत्येक पद का मराठी अर्थ):

गुरु ज्ञान का सूर्य है, शिष्य की बाती: गुरु ज्ञान का सूर्य है और शिष्य उस दीपक की बाती है।

गुरु के प्रकाश से जीवन का भोर: गुरु के ज्ञान के प्रकाश से जीवन का एक नया सवेरा होता है।

गुरु वही पारसमणि है, शिष्य सोना बन जाता है: गुरु उस पारसमणि के समान है, जो शिष्य को स्पर्श करके उसे शुद्ध (सोने के समान) बना देता है।

कबीर गाई गुरु महिमा, हे भक्ति की सच्ची हवा: कबीर दास गुरु का गुणगान करते हैं, यही सच्ची भक्ति है।

7. सातवाँ चरण: अंतिम सार 🌟

इस दोहे का अर्थ है कि गुरु ईश्वर से भी महान हैं, ज्ञान और मुक्ति के दाता हैं, उनसे भी श्रेष्ठ हैं। उनके समक्ष विनम्र होना चाहिए, उनकी आज्ञाकारिता में रहना चाहिए, यही कबीर का वचन है, सार्थक जीवन जिएँ।

(प्रत्येक पद का मराठी अर्थ):

इस दोहे का अर्थ है, गुरु ईश्वर से भी महान हैं: इस दोहे का सार है कि गुरु ईश्वर से भी महान हैं।

ज्ञान और मुक्ति के दाता हैं, उनसे भी महान: क्योंकि ज्ञान और मुक्ति देने वाले गुरु ईश्वर से भी महान हैं।

उनके समक्ष विनम्र रहें, उनकी आज्ञा का पालन करें: शिष्य को गुरु के समक्ष सदैव विनम्र रहना चाहिए और उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए।

कबीर का यह कथन, सार्थक जीवन जिएँ: कबीर दास जी के इस उपदेश का पालन करके अपने जीवन को सफल बनाएँ।

--अतुल परब
--दिनांक-03.11.2025-सोमवार.
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