📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-70-🌊शांति का सागर:🧘📜🕊️😊

Started by Atul Kaviraje, November 05, 2025, 11:01:47 AM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-70-

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।70।।

🌊शांति का सागर: गीता श्लोक 70 पर आधारित एक कविता 🧘📜

मूल श्लोक:
अपूर्यमानमचलप्रतशं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्त।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामामाप्नोति न कामामाकिमाप्नोति न कामामाकिमापनोति न कामामिकिमापनोति इच्छाओं की धाराएं निरंतर बहती रहती हैं;
परंतु आत्मसंतुष्ट योगी कभी विचलित नहीं होता।

(अर्थ: इसी प्रकार योगी के मन में कामनाओं की अनेक धाराएँ प्रवेश करती हैं, लेकिन वह विचलित नहीं होता।)

3. स्थिर मन 🏞�

जैसे नदियों के आने से समुद्र नहीं फूलता;
इसी प्रकार योगी कामनाओं के कारण हर्ष या दुःख प्रकट नहीं करता।
न कोई तृष्णा, न कोई अभाव, वह पूर्ण है;
वह आने और जाने वाली इच्छाओं को नियंत्रित करता है।

(अर्थ: जिस प्रकार सागर को और जल की आवश्यकता नहीं होती, वह तृप्त रहता है, उसी प्रकार आत्म-तृप्त योगी आत्म-ज्ञान से पूर्ण होता है।)

4. इच्छाओं का स्वरूप 🌪�

क्रियाशील आत्मा इच्छाओं के पीछे भागती है;
एक इच्छा पूरी होते ही वह दूसरी की लालसा करती है।
रेगिस्तानी हिरण की तरह, वह जल की आशा करती है;
इच्छाओं के जाल में, वह बेचैन होकर भटकती रहती है।

(अर्थ: इसके विपरीत, जो मनुष्य इच्छाओं के अधीन है, वह निरंतर एक इच्छा की पूर्ति के लिए दौड़ता रहता है।)

5. शांति का रहस्य 🕊�

वह शांति प्राप्त करे, जो सागर बन गया है;
जिसका मन विकारों की लहरों से विचलित नहीं होता।
इच्छाएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन वह अनासक्त रहता है;
केवल वही परम शांति का अनुभव करता है।

(अर्थ: जो मनुष्य अपने भीतर इच्छाओं को लीन कर लेता है और विकारों से मुक्त रहता है, वही परम शांति को प्राप्त करता है।)

6. अंतर ⚖️

वह कर्म में अशांत रहे, शांति प्राप्त न कर सके;
क्योंकि उसका सुख है, वह बाह्य पदार्थों के बल पर चलता है।
योगी शांति में आनंदित होता है, आंतरिक आनंद को जानता है;
इसीलिए 'वह' परम सुख का अधिकारी बनता है।

(अर्थ: जो व्यक्ति केवल इच्छाओं (कर्मों) की इच्छा करता है, वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि वह बाह्य सुखों पर निर्भर रहता है।)

7. निष्कर्ष (भक्ति) 🙏

हे प्रभु! हमें भी ऐसी ही दृढ़ बुद्धि प्रदान करें;
हम मन के सागर बनें, बिना किसी सीमा को छोड़े।
सभी इच्छाएँ, सभी प्रलोभन, आते-जाते हैं;
मुझे आपके चरणों में शांति मिले, मेरी भक्ति सच्ची है।

(अर्थ: इस श्लोक की विषयवस्तु को आत्मसात करके, हम दृढ़ और अटल रहने के लिए प्रेरित हों।)

🌊 इमोजी सारांश
संकल्पना मराठी अर्थ इमोजी

अचल सागर गरिमा, पूर्णता 🌊
आपाः / इच्छा नदियाँ / इच्छा, प्रवाह 💧➡️
स्थिप्रज्ञ योगी, स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति 🧘�♂️💎
शांति परम आनंद, संतोष 🕊�😊
जो काम-संबंधी इच्छाओं के पीछे भागता है, बेचैन 🏃�♂️🔥

🪷 समग्र सारांश:

एक योगी (🧘�♂️) एक परिपूर्ण सागर (🌊) के समान होता है,
जिसमें इच्छा की नदियाँ (💧➡️) आती हैं,
परन्तु विचलित नहीं करतीं (❌),
इसलिए वह शांति प्राप्त होती है (🕊�), काम से संबंधित नहीं (🏃�♂️)।

--अतुल परब
--दिनांक-04.11.2025-मंगळवार.
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