📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-72-🌅 कविता:0

Started by Atul Kaviraje, November 08, 2025, 02:11:25 PM

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Atul Kaviraje

📜 श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २: सांख्ययोग - श्लोक-72-

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।72।।

🙏 1. आरंभ (ब्राह्मी अवस्था का परिचय)

🌅 कविता:
यही अवस्था है 'ब्राह्मी' पाथर, श्री हरि बोलते हैं,
मन शांत हो, सब द्वैत, सत्य को जान,
इच्छा, आसक्ति, अहंकार का त्याग कर देना चाहिए,
तब स्थिर मन से सनातन रहना चाहिए।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पदच अर्थ):
हे पार्थ (अर्जुन), भगवान कृष्ण कहते हैं कि यही ब्राह्मी अवस्था है।

इस अवस्था में मन पूर्णतः शांत हो जाता है और व्यक्ति जीवन में सुख-दुःख जैसे सभी द्वैत को त्यागकर केवल परम सत्य को जान लेता है।
इस अवस्था तक पहुँचने के लिए सभी प्रकार की इच्छाओं, आसक्ति और अहंकार का त्याग करना आवश्यक है।
तब साधक को स्थिर मन से उस सनातन आत्मा में स्थिर रहना सीखना चाहिए।

इमोजी सारांश: 🧘�♀️✨🕊�

🛡� 2. ईर्ष्या से मुक्ति (नानं प्राप्य विमुह्यति)
🎶 कविता:
यह ज्ञान प्राप्त हो जाने पर, ईर्ष्या से कभी ग्रस्त नहीं होना पड़ता,
अज्ञान के गर्त में कभी प्रवेश नहीं करना पड़ता,
वह सत्य और असत्य को पहचान लेता है,
अंधकार दूर हो जाता है और प्रकाश उसे आलिंगन में ले लेता है।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पदच अर्थ):
एक बार आत्म-ज्ञान की यह ब्राह्मी अवस्था प्राप्त हो जाने पर, साधक को फिर कभी संसार का प्रलोभन या आकर्षण महसूस नहीं होता।
वह फिर कभी अज्ञान, मोह और माया की गहरी घाटी में नहीं जाता या फँसता।
उसे सत्य (आत्मा) और असत्य (शरीर/संसार) की पूरी तरह स्पष्ट समझ हो जाती है।
उसके मन का अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है और आत्म-ज्ञान का उज्ज्वल प्रकाश प्राप्त होता है।

इमोजी सारांश: 💡🚫🔗

🏞� 3. जीवन में स्थिरता (शांत भाव)
🎶 कविता:
सुख-दुःख में समभाव रखना चाहिए,
मान-अपमान को सहजता से स्वीकार करना चाहिए,
संसार के सभी खेलों को शांति से देखना चाहिए,
स्थिरता उसका साथ कभी नहीं छोड़ती।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पदच अर्थ):
जीवन में चाहे कितना भी सुख-दुःख आए, साधक अपने मन में समभाव बनाए रखता है।
चाहे उसे मान मिले या अपमान, वह दोनों को सहजता से स्वीकार कर लेता है।
वह संसार की सभी घटनाओं और मामलों को तटस्थ भाव से देखता है।
जीवन की किसी भी परिस्थिति में उसकी मानसिक स्थिरता डगमगाती नहीं है।

इमोजी सारांश: ⚖️😌🧘

⏳ 4. अभ्यास की परीक्षा (अंत समय)
🎶 कविता:
जब जीवन का अंतिम समय आता है,
शरीर जर्जर हो जाए तो भी बुद्धि विचलित नहीं होती,
वह इसी ब्राह्मी अवस्था में स्थिर रहता है,
आत्मा अंतिम क्षण को शांति से देखती है।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पदच अर्थ):
जब मानव जीवन का अंतिम क्षण निकट आता है।
शरीर थका हुआ, दुर्बल या पीड़ा से पीड़ित हो तो भी बुद्धि विचलित नहीं होती।
साधक जीवन भर अर्जित ब्राह्मी अवस्था में विश्वास के साथ अडिग रहता है।
मृत्यु के निर्णायक क्षण में आत्मा शरीर के त्याग को शांत भाव से देखती है।

इमोजी सारांश: 🕰�💎🙏

🌌 5. ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष)
🎶 कविता:
अंत में, वह महान 'ब्रह्मनिर्वाण' प्राप्त करता है,
जन्म-मृत्यु के कठोर बंधन टूट जाते हैं,
वह परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है,
वह शाश्वत आनंद का अनुभव करता है।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पद अर्थ):
इस दृढ़ता के परिणामस्वरूप, वह महानतम और पवित्रतम ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करता है।
जन्म-मृत्यु का कठोर चक्र हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
साधक स्वयं को परमात्मा में विलीन कर लेता है, आत्मा और ब्रह्म एक हो जाते हैं।
वह अनंत, शाश्वत आनंद और परम शांति का अनुभव करता है।

इमोजी सारांश: 💫♾️🕉�

🎁 6. फल का महत्व (प्रेरणा)
🎶 कविता:
तो पार्थ! इस अवस्था को अर्जित करो,
संसार में रहते हुए भी योग का अभ्यास करो,
यही मोक्ष का सर्वोत्तम और सरल मार्ग है,
श्रीकृष्ण के वचन ही जीवन का अर्थ हैं।

मराठी अर्थ (प्रत्येक पद अर्थ):
हे पार्थ, अपने प्रयासों से इस ब्राह्मी अवस्था को प्राप्त करो।
संसार में रहते हुए भी कर्म करते हुए निष्काम योग का अभ्यास करो।
यही सभी बंधनों से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
भगवान कृष्ण के ये वचन ही जीवन का सच्चा अर्थ हैं।

इमोजी सारांश: ✅👑🧭

🚩 7. निष्कर्ष (अंतिम घोष)
🎶 कविता:
ब्राह्मी अवस्था में जियो और शांति से मरो,
आत्माराम! ब्रह्म बनो और तैरो,
स्थितप्रज्ञ बनो, यही गीता का सार है,
यही मुक्ति का अंतिम और सुंदर द्वार है!

मराठी अर्थ (प्रत्येक पद अर्थ):
ब्राह्मी अवस्था की शांति में रहो और शांत भाव से शरीर का त्याग करो।
स्वयं ब्रह्म बनो और संसार रूपी सागर से पार उतरो।
स्थितप्रज्ञ बनना, यही गीता का मूल सार है।
ब्राह्मी अवस्था प्राप्त करना परम मुक्ति का पवित्र द्वार है।

इमोजी सारांश: 🚪🙏💖📝

📜 संक्षिप्त अर्थ
दूसरे अध्याय के उपसंहार में भगवान कृष्ण श्लोक 72 में कहते हैं कि,
जो व्यक्ति अनासक्ति, मोह-अहंकार का त्याग और स्थिर बुद्धि के साथ ब्राह्मी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन में फिर कभी मोहित नहीं होता।
यदि वह अंत समय में भी इसी अवस्था में स्थिर रहता है, तो उसे ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) प्राप्त होता है।
यह मानव जीवन की अंतिम उपलब्धि है।

--अतुल परब
--दिनांक-06.11.2025-गुरुवार.     
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