तीसरा अध्यायः कर्मयोग-श्रीमद्भगवदगीता-श्लोक 2 🌺कविता-🙏💖🛣️🌟🚪☝️🎯🤯🌀

Started by Atul Kaviraje, November 09, 2025, 06:52:55 PM

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Atul Kaviraje

तीसरा अध्यायः कर्मयोग-श्रीमद्भगवदगीता

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।।2।।

🌺 कर्म योग - श्रीमद्भगवद गीता - अध्याय 3, श्लोक 2 🌺
📜 श्लोक:
व्यामि श्रेणे वाक्येन बुद्धि मोहयसि वमे। तदेकं वदानिश्चित्य येन श्रेयो हामापाणु यम्।।2।।
व्यामि श्रेणे वाक्येन बुद्धि मोहयसि वमे। तदेकं वदानिश्चित्य येन श्रेयो हामापाणु यम्।।2।।
🔹 संक्षिप्त अर्थ सारांश:

🙏हे कृष्ण, आपके मिश्रित शब्दों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है।
अत: आप ही मुझे एकमात्र निश्चित मार्ग बतायें,
जिससे मुझे परम कल्याण (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।

🌼 लंबी  कविता (भक्तिपूर्ण, छंद के साथ) 🌼

1. शुरुआत (भ्रम की जड़) 😟

बुद्धि कर्म से श्रेष्ठ है, हे भगवान! आपने मुझे बता दिया है;
फिर आपने मुझ पर यह भयंकर युद्ध क्यों थोपा?
आप एक ही समय में दो मार्ग क्यों दिखाते हैं,
मिश्रित वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है।

(श्लोक का अर्थ: हे ईश्वर, यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं,
तो फिर आप मुझे इस भयंकर युद्ध (कर्म) में क्यों उकसा रहे हैं?
आपकी अस्पष्ट (मिश्रित) वाणी से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है।)

2. भ्रम (द्वैत का भाव) 🤔

एक ओर आप कहते हैं, 'आप निष्काम भाव से कर्म करते हैं',
दूसरी ओर, 'आत्म-जागरूक होते हुए भी शांत भाव से'।
यद्यपि दोनों नाम बहुत भिन्न प्रतीत होते हैं,
मेरा मन दोनों के बीच असहाय हो गया है।

(श्लोक का अर्थ: एक ओर आप मुझे फल की इच्छा किए बिना कर्म करने को कहते हैं,
और दूसरी ओर आप मुझे शांतचित्त होकर आत्मज्ञान में स्थित होने को कहते हैं।
चूँकि ये दोनों मार्ग भिन्न प्रतीत होते हैं, इसलिए मेरा मन भ्रमित है।)

3. भ्रम की स्थिति (विवेक का अभाव) 😵

कौन सा लक्ष्य निश्चित है, कौन सा मार्ग सत्य है,
संतों का सामंजस्य कैसा है, सही दिशाओं की हवा कैसी है।
न विवेक स्थिर है, न संकल्प की शक्ति,
मेरा मन निर्जन वन में लगी आग के समान हो गया है।

(श्लोक का अर्थ: मैं नहीं जानता कि निश्चित लक्ष्य क्या है और सच्चा मार्ग क्या है।
मेरी निर्णय शक्ति अस्थिर हो गई है।
इस कारण मेरा मन निर्जन वन में जल के समान विचलित है।)

4. शिष्य की विनती (विनम्र प्रार्थना) 🙏

आप मेरे गुरु हैं, आप मेरे सारथी हैं,
मैं आपके चरणों में शरणागत हूँ, आपका प्रेम धारण किए हुए।
हे कृपालु केशव, अज्ञान दूर करो,
हे भगवान, स्पष्ट शब्दों से मुझे एक निश्चित मार्ग दिखाओ।

(श्लोक का अर्थ: हे कृष्ण (केशव), आप मेरे गुरु और मार्गदर्शक हैं।
मैंने आपके चरणों की शरण ली है।
मुझ पर से अज्ञान का पर्दा हटा दो और मुझे स्पष्ट मार्गदर्शन दो।)

5. एक निश्चित मार्ग की माँग (एकम वद केकित्य) 🎯

तदेकम वद केकित्य, यही मेरी विनती है,
कल्याण दाता, मुझे तुरंत मार्ग बताओ।
मुझे अनेक विकल्प नहीं चाहिए, एक क्षणिक यात्रा,
मुझे एक चाहिए, कल्याण का धागा, मेरी आत्मा।

(श्लोक का अर्थ: "मुझे एकमात्र मार्ग बताइए," यही मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है।
मैं अनेक विकल्पों में नहीं फँसना चाहता,
मुझे अपनी आत्मा के कल्याण के लिए केवल एक ही मार्ग चाहिए।)

6. परम लक्ष्य (श्रेयोऽहम् आप्नुयाम्) 🌟

जिससे मुझे अवश्य ही श्रेय प्राप्त होगा,
यह जन्म-मरण का बंधन पूर्णतः टूट जाएगा।
मजाल, अब आप मुझे वही योग सिखाएँ,
मुझे तत्काल यही मोक्ष मार्ग दिखाएँ।

(श्लोक का अर्थ: जिससे मुझे अवश्य ही परम कल्याण (श्रेय) और मोक्ष प्राप्त होगा,
जिससे मैं जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाऊँगा,
मुझे तत्काल वह मार्ग बताएँ।)

7. भक्ति का समापन (पूर्ण समर्पण) 💖

एक प्रकार से आपके नाम का चिंतन,
वहाँ हे प्रभु, भक्त की संतुष्टि है।
कर्म और ज्ञान के बीच का अंतर आप ही मिटा सकते हैं,
मेरे जीवन की नैया आप ही पार लगा सकते हैं।

(श्लोक का अर्थ: भक्त की सच्ची संतुष्टि एक प्रकार से आपके नाम का चिंतन करने में है।
आप ही कर्म और ज्ञान के भेद को दूर करते हैं।
और संकटों से मेरी जीवन-नैया को राह दिखाते हैं।)

🌈 इमोजी सारांश (इमोजी सारांश) 🌈
अनुभाग अर्थ इमोजी / प्रतीक

व्यमिश्रेणेवे वाक्यायेन अस्पष्ट वाणी 🗣�❓
बुद्धिम मोहयासिव मे मन रालालः 🤯🌀
तदेकं वद् केट्ट्य एकः सगण ☝️🎯
येन श्रेयोहमप्नुयम जो कल्याण (मोक्ष) देगा 🌟🚪
पूर्ण भक्ति मार्गदर्शन और भक्तिमय अर्ज 🙏💖🛣�

🌺 यह दूसरे श्लोक का भक्तिमय अर्थ और काव्यात्मक भाष्य है श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय पूर्ण। 🌺

--अतुल परब
--दिनांक-08.11.2025-शनिवार.
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