🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता: तीसरा अध्याय - कर्म योग 🚩श्लोक 5:-कविता-

Started by Atul Kaviraje, November 11, 2025, 10:49:11 AM

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Atul Kaviraje

तीसरा अध्यायः कर्मयोग-श्रीमद्भगवदगीता-

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।

🕉� श्रीमद्भगवद्गीता: तीसरा अध्याय - कर्म योग

🚩श्लोक 5:
न ही यह अनुभव का परिणाम है.
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।

📝 प्रत्येक पद का मराठी अर्थ (पद और चरणवार)

संस्कृत शब्द (चरण) | मराठी अर्थ

न हि कश्चित् - कोई मनुष्य नहीं, वास्तव में
एक क्षण के लिए भी - एक क्षण के लिए भी
जाना - कभी भी
तिष्ठति अकर्मकृत् - कर्म किए बिना नहीं रह सकता

(न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठ्यकर्मकृत्)
(वास्तव में, कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता)

करिते हि - (वह) अवश्य करता है
अवशा - परतंत्र / असहाय
कर्म सर्वः - सभी कर्म करते हैं
प्रकृतिजै: - प्रकृति से उत्पन्न
गुणै: - गुणों (सत्व, रज, तम) से

(कार्यते ह्यवशा: कर्म सर्व: प्रकृति जैर्गुणै:)
(क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के कारण ही सभी को कर्म करने के लिए बनाया गया है।)

🙏 तुकबंदियों सहित भक्तिपूर्ण, लंबी मराठी कविता (07 कड़वी)

1. एक अंतहीन जीवन चक्र ⏳

इस संसार में कोई भी जीव,
एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता;
कभी नहीं रह सकता,
प्रकृति के इस नियम को देखो।

2. गुणों की अनिवार्य प्रेरणा 🔥

प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है,
क्योंकि प्रकृति के गुण विद्यमान हैं;
सत्व, रज, तम ये त्रिगुण गुण,
उसे कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं।

3. कर्म करने की विवशता ⚙️

यदि मनुष्य मन में चाहे भी,
कि मैं अभी कर्म करना बंद कर दूँ;
फिर भी प्रकृति उसे आगे खींचती है,
उसे इस नियम को समझना चाहिए।

4. प्रकृति का नियम अपरिवर्तनीय है 🌿

आँखों से देखना, साँस लेना,
ये भी कर्म हैं;
यह प्रकृति के गुणों का कार्य है,
आत्मा को कर्म करने के लिए बाध्य करता है।

5. स्वतंत्रता का बोध 🔗

हमारी इच्छाओं पर कोई नियंत्रण नहीं है,
आत्मा की स्थिति असहाय है;
गुणों के प्रभाव में फँसी हुई,
कर्म के स्वरूप का समाधान नहीं करती।

6. सत्व-रज-तम का खेल ✨

यदि सत्व-गुण है, तो कर्म शांत है,
रजो-गुण तीव्रता की गति देता है;
अज्ञान के गुण आलस्य और प्रमाद हैं,
उन गुणों की प्रवृत्ति।

7. कर्म योग का महत्व 💫

इसलिए कर्म करना अविचल है,
फल की आसक्ति का त्याग करना ज्ञान है;
स्वभावानुसार कर्म करते रहना,
यही कर्म योग का सच्चा सम्मान है।

✨ कविता का संक्षिप्त अर्थ

व्यक्ति एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता,
क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्व, रज और तम ये तीन गुण
उसे स्वतंत्र और कर्म करने योग्य बनाते हैं।
कर्म करना आत्मा का स्वभाव है।

🖼� चित्र, प्रतीक और इमोजी प्रतीक / चिह्न

🕉� (ओ) — अध्यात्म और परम शक्ति
🚩 (ध्वज) — भक्ति और कर्तव्य का प्रतीक
⏳ (समय का क्षण) — कर्म का सतत गतिशील चक्र
🔥 (गुणों की ऊर्जा) — तीन गुणों की प्रेरणा

⚙️ (कर्म चक्र) — क्रिया का चक्र
🌿 (प्रकृति) — प्रकृति का शाश्वत नियम
🔗 (बंधन) — स्वतंत्रता का प्रतीक
✨ (त्रिगुण) — सत्व, रज, तम का तेज
💫 (कर्म योग) — ज्ञान और वैराग्य का मिलन

🔠 इमोजी और शब्द सारांश (क्षैतिज मार्ग)

🕉� | श्रीमद्भगवद्गीता | 🚩 | तीसरा | अध्याय | कर्म योग |
⏳ | कोई भी जीव एक क्षण के लिए भी | रुकता नहीं |
🔥 | प्रकृति के गुण | स्वतंत्रता | करते हैं |
⚙️ | कर्म | अनिवार्य है |
🌿 | प्रकृति का नियम | अपरिवर्तनीय है |
🔗 | इच्छा | नियंत्रित नहीं है |
✨ | सत्व | रज | तम | खेल |
💫 | आसक्ति | सोडा | कर्म योग | मान |

🌼 अंतिम विचार:

कर्म से बचना नहीं, बल्कि उसे शुद्ध रूप से करना है —
यही भगवद्गीता का संदेश है।
आत्मा को कर्म से मुक्ति नहीं मिलती,
बल्कि अनासक्त कर्म से मुक्ति की गति मिलती है।

--अतुल परब
--दिनांक-11.11.2025-मंगळवार. 
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