॥ श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 3, श्लोक 7 ॥-कविता-🙏 🕉️ 🏹 🧠 💡 👀 👂 💪 🛠️ 🌬️

Started by Atul Kaviraje, November 13, 2025, 11:28:08 AM

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Atul Kaviraje

तीसरा अध्यायः कर्मयोग-श्रीमद्भगवदगीता-

यस्त्विन्द्रियाणी मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।7।।

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 3, श्लोक 7 ॥

॥ श्लोक ॥
यस्तविन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेཽअर्जुन।
कर्मेन्द्रियै: कर्म-योग-मासक्त: स विशिष्यते।।7।।

॥ मराठी अर्थ सहित कविता (7 श्लोक) ॥

कड़वे 1: अर्जुन को आरंभ और संबोधन

हे अर्जुन, कृष्ण की बात सुनो,
साधक का मार्ग एक है;
जहाँ इन्द्रियाँ शांत हैं,
वही ज्ञान से संपन्न है!

कड़वे 2: मन पर नियंत्रण

मन को बुद्धि के अधीन करो,
इन्द्रियों की इच्छाओं से पूर्णतः मुक्त;
केवल बाह्य दिखावा न हो,
आंतरिक स्थिरता सदैव बनी रहे!

कड़वे 3: इंद्रियों का उपयोग

हाथ-पैर, वाणी, कान-आँख,
कर्मेंद्रियों को कर्म में लगाओ;
वह कर्मयोग को भली-भाँति जानता है,
जो भक्तिभाव से चलता है, वही श्रेष्ठ है!

कड़वे 4: वैराग्य की भावना

वह कर्म करेगा, कोई आशा नहीं होगी,
फल की कोई इच्छा नहीं होगी;
यदि 'मैं कर्ता हूँ' का भाव न हो,
तो वह संसार में आसक्तिरहित होकर रहेगा!

कड़वे 5: मिथ्यात्व पर श्रेष्ठता

जो केवल बाह्य त्याग का दावा करता है,
और मन में विचारों का निवास;
यह उस पाखंड से श्रेष्ठ है,
यही योगमार्ग पर सच्ची भक्ति है!

कड़वे 6: कर्मयोग का फल

कर्मयोगी को यह जानना चाहिए कि वह विशिष्ट है,
शुद्ध मन से उसे दिव्यता प्राप्त करनी चाहिए;
उसका जीवन प्रकाशित होना चाहिए,
उसे परम शांति में निवास करना चाहिए!

कड़वे 7: निष्कर्ष और समर्पण

अतः, यह कर्म करो,
अपना मन ईश्वर को समर्पित करो;
कर्म योग ही राजमार्ग है,
यही मुक्ति का सच्चा मार्ग है!

🌸 इमोजी सारांश 🌸

अवधारणा प्रतीक:

ईश्वर/भक्ति 🙏 🕉�
अर्जुन 🏹
मन/बुद्धि 🧠 💡
इंद्रियाँ 👀 👂
कर्म 💪 🛠�
अ-बल 🌬� 🧘�♀️
श्रेष्ठता/शांति ✨ 🥇

सभी शब्द और सभी इमोजी (क्षैतिज रूप से):

कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, सुनो, साधकों का मार्ग वही है, जहाँ इंद्रियाँ शांत हों, वही ज्ञान से समृद्ध है।
मन को बुद्धि के अधीन कर दो, इंद्रियों से पूरी तरह मुक्त हो जाओ, केवल बाहरी दिखावा न हो, आंतरिक स्थिरता सदैव बनी रहे।
हाथों को पढ़ो, पैर, कान, आँख, कर्मेन्द्रियाँ, जो कर्मयोग को जानता है, जो भक्तिपूर्वक चलता है, वही सर्वोत्तम है।
यदि वह कर्म नहीं करता, तो फल की आशा नहीं रहेगी, कोई कामना नहीं रहेगी, मैं कर्ता हूँ, वही संसार में आसक्ति रहित होकर रहता है।
जो केवल बाह्य संन्यास का दावा करता है और मन में विचारों के नगर में स्थित है, यही योग का सर्वोत्तम मार्ग है, सच्चा मार्ग है। समर्पित कर्मयोगी को यह जानना चाहिए कि वह विशिष्ट है, शुद्ध मन से उसे दिव्यता प्राप्त करनी चाहिए, उसका जीवन प्रकाशित होना चाहिए, उसे परम शांति में निवास करना चाहिए। इसलिए उसे यह कर्म करना चाहिए, अपने मन को ईश्वर को समर्पित करना चाहिए। कर्मयोग राजमार्ग है, मुक्ति का सच्चा मार्ग है।

🙏 🕉� 🏹 🧠 💡 👀 👂 💪 🛠� 🌬� 🧘�♀️ ✨ 🥇

--अतुल परब
--दिनांक-13.11.2025-गुरुवार.           
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