🙏🏽📜 कर्म योग की मधुरता - श्लोक 9 📜🙏🏽 कविता - 'यज्ञार्थ कर्म'-🧘🏽‍♀️ 🗡️

Started by Atul Kaviraje, November 16, 2025, 10:38:56 AM

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Atul Kaviraje

तीसरा अध्यायः कर्मयोग-श्रीमद्भगवदगीता-

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।।9।।

🙏🏽📜 कर्म योग की मधुरता - श्लोक 9 📜🙏🏽

 कविता - 'यज्ञार्थ कर्म'

(श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 3 - कर्म योग, श्लोक 9)

श्लोक:

यज्ञार्थकर्मणो न्यत्र लोकोयायं कर्मबन्धन:। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचार।।9।।

🎯 संक्षिप्त अर्थ:
यज्ञ (समग्र कल्याण के लिए) के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म मनुष्य को बाँधते हैं। इसलिए हे अर्जुन, तुम्हें आसक्ति से मुक्त होकर केवल उसी यज्ञ के लिए कर्म करना चाहिए।

भक्ति रसपूर्ण काव्य
1. दीक्षा (पहला कड़वा)

कर्म की गति गहन है, अर्जुन, मैं तुमसे कहता हूँ।
फलों के आश्रय में मत रहो, यही वास्तविक भूमि है।
स्वार्थ के मोह में पड़कर आत्मा बंध जाती है,
उस बंधन से मुक्त होने का केवल एक ही उपाय है।

अर्थ:
हे अर्जुन, मैं तुमसे कहता हूँ, कर्म का स्वरूप बहुत गहन है।
कर्म के फल पर निर्भर मत रहो, क्योंकि यही कर्म का वास्तविक क्षेत्र है।
यदि तुम स्वार्थ के मोह में पड़ जाते हो, तो आत्मा बंधन में फँस जाती है,
उस बंधन से मुक्ति का केवल एक ही उपाय है।

2. बंधन का स्वरूप

त्याग के बिना किया गया कर्म, बंधन कहलाता है,
उसी के कारण यह मानवजाति दुःखी और दीन हो जाती है।
यदि तुम फल की इच्छा करते हो, तो वह मोह की बेड़ी बन जाती है,
वह बेड़ी कभी नहीं टूट सकती, चाहे तुम उसे कितनी भी जल्दबाजी में करो।

अर्थ:
वास्तविक बंधन वह कर्म है जो ईश्वर या समाज को समर्पित नहीं है।
उसी के कारण यह मानवजाति दुःखी और पतित हो जाती है।
फल की इच्छा करने से आसक्ति की बेड़ियाँ बनती हैं,
चाहे आप कितनी भी जल्दबाजी करें, इसे तोड़ा नहीं जा सकता।

3. 'यज्ञ' क्या है?

यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है,
यह संसार का उपकार करने वाला कर्म है।
देश के लिए, धर्म के लिए, ज़रूरतमंदों के लिए आप जो कुछ भी करते हैं,
निःस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करके, आप कर्म के बंधनों को तोड़ देंगे।

अर्थ:
यज्ञ केवल अग्नि में कुछ आहुति देना नहीं है।
बल्कि, यह संसार का उपकार करने वाला कर्म है।
देश के लिए, धर्म के लिए, और ज़रूरतमंदों के लिए आप जो कुछ भी करते हैं,
वह सेवा आपके कर्म के बंधनों को तोड़ देगी।

4. मुक्ति का मंत्र

अतः आपको अपना कर्म केवल उस आहुति के लिए करना चाहिए,
हे कौन्तेय, यही मुक्ति की असली गाँठ है।
यदि आप अपना कर्म अन्य विचारों से भी करते हैं, तो भी आपको उसे बाँधना होगा,
तभी आप फल की चिंता छोड़कर अपना कर्म कर पाएँगे।

अर्थ:
अतः तुम्हें उस यज्ञ के लाभ के लिए ही कर्म करना चाहिए।
हे अर्जुन, यही मोक्ष प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।
यदि तुम स्वार्थवश कर्म करोगे, तो वह तुम्हें बाँध लेगा।
फल की चिंता त्यागने के बाद ही तुम अपना वास्तविक कर्म कर पाओगे।

5. आसक्ति का त्याग

'मुक्त संघ' का अर्थ है फल के प्रति आसक्ति न रखना।
कर्म करते समय मन में किसी प्रकार की दुर्गंध न हो।
निष्कपट भाव से कर्म करो, परन्तु अहंकार का त्याग करो।
यही कर्म मार्ग है, जान लो कि ईश्वर ही आधार हैं।

अर्थ:
'मुक्त संघ' का अर्थ है फल के प्रति आसक्ति न रखना।
कर्म करते समय मन में किसी प्रकार की आसक्ति न हो।
निष्कपट भाव से कर्म करो, परन्तु अहंकार का त्याग करो।
यही कर्म मार्ग है, जान लो कि ईश्वर ही आधार हैं।

6. जीवन एक सेवा है

जो भी तुम्हारा कर्तव्य है, उसे तुम्हें ठीक से करना चाहिए,
उसका फल अर्पित करो, तुम्हें निःसंदेह रहना चाहिए।
शुद्ध मन से कर्म करना, यही सच्ची पूजा है, इसे जानो,
जीवन ही सेवा है, यही सच्चा कर्म है।

अर्थ:
अपना कर्तव्य ठीक से और सही ढंग से करो।
उसका फल मुझे (ईश्वर को) अर्पित करो और निःसंदेह रहो।
शुद्ध, सच्चे मन से कर्म करना ही सच्ची पूजा है।
जीवन सेवा है - यही सच्चा कर्म है।

7. निष्कर्ष (सातवाँ चरण)

आसक्ति रहित होकर कर्म करो और मुक्त हो जाओ, यही योग की सच्ची अवस्था है,
बंधन से मुक्ति का यही निश्चित मार्ग है।
हे कौन्तेय, अनासक्ति रहित होकर कर्म करो, संशय मत करो,
श्रीकृष्ण की शिक्षाओं से जीवन की नैया पार लगाओ।

अर्थ:
कर्म करो और साथ ही मुक्त रहो - यही योग की सच्ची अवस्था है।
बंधन से मुक्ति का यही निश्चित मार्ग है।
हे अर्जुन, आसक्ति रहित होकर कर्म करो और संशय मत करो।
श्री कृष्ण की शिक्षाओं का पालन करके जीवन पथ को प्रकाशित करो।
✨ प्रतीक, चित्र और इमोजी सारांश:

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--अतुल परब
--दिनांक-15.11.2025-शनिवार.       
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