✍️ कविता: "बराबरी वालों के बीच करुणा"🤝⚖️👤🌑💡💖🌎

Started by Atul Kaviraje, November 18, 2025, 04:09:41 PM

Previous topic - Next topic

Atul Kaviraje

करुणा कोई रिश्ता नहीं है
मरहम लगाने वाले और घायल के बीच
यह बराबरी वालों के बीच का रिश्ता है।
जब हम अपने अंधेरे को अच्छी तरह जानते हैं, तभी हम दूसरों के अंधेरे के साथ मौजूद रह पाते हैं।
करुणा वास्तविक हो जाती है,
जब हम अपनी साझा मानवता को पहचानते हैं।

✍️  कविता: "बराबरी वालों के बीच करुणा"

1. भूमिकाओं से परे (पहिला कदवा)
करुणा कोई परिभाषित रिश्ता नहीं है,
जहाँ एक व्यक्ति पूर्ण होता है और दूसरा पीछे छूट जाता है।
कोई भी मरहम लगाने वाला दर्द में पड़े व्यक्ति से ऊपर नहीं होता,
यह बंधन समान हानि और लाभ पर टिका होता है।

अर्थ: सच्ची करुणा एक व्यक्ति (मदद करने वाले) को दूसरे व्यक्ति (मदद की ज़रूरत वाले व्यक्ति) से श्रेष्ठ नहीं बनाती। इसे "मरहम लगाने वाले" और "घायल" की भूमिकाओं से परिभाषित नहीं किया जाता।

2. बराबरी के बीच एक कड़ी (दुसरा कदवा)
यह ऊँचाई से दी गई दया नहीं है,
बल्कि अंधकार और प्रकाश के बीच एक सरल कड़ी है।
यह बराबरी के लोगों के बीच एक जाना-पहचाना रिश्ता है,
जहाँ ताकत और कमजोरी दोनों को निष्पक्ष रूप से दर्शाया जाता है।

अर्थ: करुणा समानता पर आधारित एक संबंध है, दया पर नहीं। यह स्वीकार करती है कि हर किसी में ताकत और कमजोरी दोनों होती हैं, और सभी व्यक्तियों को एक ही स्तर पर रखती है।

3. अपनी परछाई को जानना (तिसरा कदवा)
हमें सबसे पहले अपनी आंतरिक रात को देखना होगा,
और उन खामियों का सामना करना होगा जो दिन के उजाले से छिप जाती हैं।
केवल जब हम अपने अंधकार को अच्छी तरह से जानते हैं,
तभी हम दूसरों की कहानियों को सही मायने में सुन सकते हैं।

अर्थ: दूसरों को सही मायने में समझने के लिए, हमें पहले अपनी गलतियों, दुखों और नकारात्मक अनुभवों (अपने अंधकार) का सामना करना होगा और उन्हें स्वीकार करना होगा।

4. दर्द में साझा उपस्थिति (चौथा कदवा)
वह आंतरिक ज्ञान, जो निराशा से प्राप्त होता है,
हमारी सहानुभूति को गहराई से विकसित होने देता है।
तब हम दूसरों के अंधकार में मौजूद रह सकते हैं,
बहनों की तरह या सच्चे ज्ञानी भाइयों की तरह।

अर्थ: दुख का व्यक्तिगत अनुभव गहरी सहानुभूति को बढ़ावा देता है। यह आत्म-ज्ञान हमें दूसरों के संकट में पूरी तरह से सहायक और समझदार बनने में सक्षम बनाता है।

5. पहचान का क्षण (पाचवा कदवा)
यह आत्मा के सामने रखा गया दर्पण है,
जहाँ टूटे हुए टुकड़े हमें संपूर्ण बनाने का प्रयास करते हैं।
जब हम दोष देखते हैं और अपनी अच्छाइयों को देखते हैं,
तो हमें एक बड़ी मानवीय दया मिलेगी।

अर्थ: करुणा तब होती है जब हम खुद को (अपने संघर्षों, अपनी असफलताओं को) दूसरे व्यक्ति में प्रतिबिंबित होते हुए पहचानते हैं। यह पहचान एक गहरी, अधिक समावेशी दया को प्रेरित करती है।

6. करुणा की वास्तविकता (सहवा कदवा)
कोई भी पूर्ण संत पूर्ण सहायता प्रदान नहीं कर सकता,
सबसे मजबूत बंधन वह होता है जो स्व-निर्मित होता है।
करुणा वास्तविक, सच्ची और गहन हो जाती है,
जब साझा, टूटी हुई ज़मीन खुशी से मिल जाती है।

अर्थ: करुणा तब सच्ची नहीं होती जब कोई दोषरहित व्यक्ति उसे प्रदान करता है, बल्कि तब होती है जब वह हमारी पारस्परिक अपूर्णताओं और साझा मानवीय अनुभव को स्वीकार करने से उत्पन्न होती है।

7. हमारी साझा मानवता (सातवा कदवा)
जब हम उपाधियों और अवस्था को भूल जाते हैं,
और द्वार के बाहर किसी और आत्मा से मिलते हैं।
जब हम अपनी साझा मानवता को स्पष्ट रूप से पहचान लेते हैं,
यही वह शुद्धतम सत्य है जो भय पर विजय प्राप्त करता है।

अर्थ: सच्ची करुणा पूरी तरह से तब साकार होती है जब हम सामाजिक भेदभावों (उपाधियों और पदवी) से परे देखते हैं और उन सार्वभौमिक अनुभवों और भावनाओं को स्वीकार करते हैं जो हम सभी को एकजुट करती हैं।

✨ इमोजी सारांश (इमोजी सारांश)
🤝⚖️👤🌑💡💖🌎

--अतुल परब
--दिनांक-18.11.2025-मंगळवार.
===========================================