अंदर की नज़र का अभ्यास: स्वामी की कृपा का अनुभव-1-[🏃‍♂️🛡️💖][🛕🙏🎶][🗣️📿👂]

Started by Atul Kaviraje, December 11, 2025, 04:28:52 PM

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Atul Kaviraje

स्वामी समर्थ सुविचार-
स्वामी के दर्शन सिर्फ़ आँखों से ही नहीं, बल्कि दिल से भी करने चाहिए।

🌸 ॥ स्वामी समर्थ सुविचार ॥ 🚩

अंदर की नज़र का महत्व: स्वामी के दर्शन सिर्फ़ आँखों से ही नहीं, बल्कि दिल से भी करने चाहिए।

लेख: व्याख्या पर पूरा और विस्तृत लेख

शीर्षक: अंदर की नज़र का अभ्यास: स्वामी की कृपा का अनुभव

स्वामी समर्थ का यह अच्छा विचार सिर्फ़ एक वाक्य नहीं है, यह पूरी आध्यात्मिक साधना का मूल है। समर्थ ने भक्तों को सिखाया कि ईश्वर के अस्तित्व को देखने के लिए बाहरी तरीकों से ज़्यादा ज़रूरी अंदर की पवित्रता है।

1. बाहरी नज़र बनाम अंदर का ज्ञान

1.1. आँखों का जुनून: बाहरी आँखें सिर्फ़ शरीर का रूप, मूर्ति या तस्वीर देख सकती हैं। वह नज़र नश्वर और सीमित है।

उदाहरण: अक्कलकोट जाकर स्वामी के जूते या मूर्ति देखने से आँखों के दर्शन हो जाते थे।

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1.2. सच्चा मतलब: दर्शन का सच्चा मतलब है संपर्क और अनुभव। दिल से लिया गया दर्शन आत्मा के लेवल पर होता है।

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1.3. चेतना देखना: स्वामी के होने की चेतना उनके कपड़ों या शरीर में नहीं है, वह हर जगह मौजूद है; उसे दिल से ही अनुभव करना होगा।

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2. भक्ति का आधार: विश्वास और वफ़ादारी

2.1. विश्वास की भूमिका: अगर दिल पवित्र है, तो छोटी सी मूर्ति भी खुद स्वामी जैसी लगेगी। अगर विश्वास नहीं है, तो स्वामी सामने होने पर भी उसे 'नॉर्मल आदमी' जैसा लग सकता है।

उदाहरण: जब छोटा बच्चा भूखा होता है, तो उसे माँ में भगवान दिखते हैं, यही शुद्ध विश्वास है।

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2.2. निष्ठा का महत्व: अगर आप निष्ठा से ध्यान करते हैं, तो स्वामी की मूर्ति या नाम से पॉजिटिव एनर्जी पैदा होती है। यह एनर्जी आँखों से दिखाई नहीं देती, लेकिन दिल से महसूस होती है।

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2.3. अंतरात्मा की तैयारी: अंतरात्मा के दर्शन का मतलब है अपने अंतरात्मा को प्रभु की कृपा के लिए तैयार करना। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को शुद्ध करना ज़रूरी है।

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3. अहंकार और दर्शन में रुकावटें

3.1. दर्शन में रुकावट: जब कोई व्यक्ति दर्शन के लिए जाता है, तो 'मैं' दर्शन कर रहा हूँ, यह अहंकार में आता है और शुद्ध अनुभव में रुकावट पैदा करता है।

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3.2. निस्सिम भाव: जब दिल निस्सिम भाव से भर जाता है, तो भगवान की कृपा अपने आप अनुभव हो सकती है, जिसके लिए आँखों की ज़रूरत नहीं होती।

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3. फल की उम्मीद: बाहरी दर्शन में अक्सर फल की उम्मीद होती है (कि मेरी इच्छा पूरी हो)। आंतरिक दर्शन अहैतुक प्रेम पर आधारित होता है।

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4. स्वामीजी का हर जगह मौजूद रूप
4.1. विराट स्वरूप: स्वामीजी का रूप सिर्फ़ अक्कलकोट तक सीमित नहीं है। यह विशाल और हर जगह मौजूद है।

उदाहरण: आसमान में बादलों को देखते समय, उनमें स्वामीजी का रूप देखना आत्मनिरीक्षण का एक उदाहरण है।

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4.2. नामस्मरण की शक्ति: 'श्री स्वामी समर्थ' का जाप करते समय, इसे आँखों से नहीं देखा जाता, लेकिन यह दिल में बस जाता है और स्वामीजी की मौजूदगी महसूस होती है।

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4.3. कण-कण में दर्शन: हर व्यक्ति में, हर घटना में और हर कण में ईश्वर के होने का अनुभव करना ही सच्चा आत्मनिरीक्षण है।

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5. संत तुकाराम महाराज का उदाहरण
5.1. विट्ठल के दर्शन: तुकाराम महाराज ने कभी विट्ठल को अपनी आँखों से (मूर्ति के रूप में) नहीं देखा। उन्हें विट्ठल के दर्शन सिर्फ़ उनके अभंग और शुद्ध भक्ति से ही हुए थे।

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5.2. एहसास का सबूत: अभंग 'भेती लगी जीव लगिसे आस' में विट्ठल से मिलने की इच्छा होती है, यह अंदर से होती है, बाहर से नहीं। भावना ही सबसे बड़ा सबूत है।

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5.3. स्वामी का भरोसा: स्वामी समर्थ का भरोसा है कि जो मुझसे पूरे दिल से डरता है, मैं उसके पास दौड़कर आऊंगा।

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--संकलन
--अतुल परब
--दिनांक-05.12.2025-शुक्रवार.
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