॥ गाँव के देवता की जात्रा: भक्ति का एक लोक उत्सव ॥🌃 🚩 ✨ 🕉️🗓️ 🌾 🙌 🔱

Started by Atul Kaviraje, December 31, 2025, 10:41:57 PM

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Atul Kaviraje

लोकल मेला: महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में पौष महीने में कई मेले और लोकल देवी-देवताओं की पालकी की रस्में होती हैं।

31 दिसंबर 2025 को महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में होने वाली 'स्थानिक जात्रा' और 'पालखी सोहला' पर आधारित एक त्योहार और भक्ति से भरी कविता यहाँ है।

॥ गाँव के देवता की जात्रा: भक्ति का एक लोक उत्सव ॥

1. पौष का महीना आ गया है,
हर गाँव में यह मेला।
गाँव के देवता के दर्शन के लिए यह भीड़ उमड़ पड़ी है।
साल का यह आखिरी दिन, खुशी का यह त्योहार।
भक्ति और विश्वास का यह पवित्र और सुंदर मेला।
🚩 🏘� 🥁 🙏

2. फूलों और पत्तियों के मेहराबों से सजी इस पालकी को देखो।
भगवान का रथ, कंधों पर उठाए, भक्ति की आवाज़ों के साथ निकल पड़ा।
गुलाल-नारियल के छिड़काव से, नाभि का रंग लाल हो जाता है।
भगवान के इस जयकारे से, दुख का यह जाल टूट जाता है। 🚶�♂️ 🏮 🌸 🎆

3. शिवरात्रि में हल्गी और संबल की आवाज़ गूंजती है।
छोटे बच्चे लेज़िम से खेलते हैं, उनके दिल भक्ति से भरे होते हैं।
गाँव सम्मान और परंपरा की इस विरासत की रक्षा करता है।
मेले को इंसानियत के पवित्र और पवित्र आईने के तौर पर देखना चाहिए।
🥁 🕺 ✨ 🤝

4. बच्चे अपने पालने और खिलौनों के साथ बहुत खुश हैं।
दुकानें मिठाइयों और पौधों से भरी हैं।
छोटे और बड़े, अपनी हंसी-ठहाकों के साथ, दर्शन को दौड़ते हैं।
गाँव के देवता के आशीर्वाद से, सभी परेशानियाँ भाग जाती हैं।
🎡 🍭 🍬 🏛�

5. बैलगाड़ी दौड़ और कुश्ती के अखाड़े रंगीन होते हैं।
पहाड़ बहादुरी और ताकत से ऊँचे खड़े होते हैं।
वह सीढ़ियों पर सिर झुकाकर बस एक ही चीज़ मांगती है।
गांव खुशियों और खुशहाली से जगमगाए, यही मेरी भगवान से दुआ है।

🐂 🤼�♂️ 💪 🌈

6. साल का यह आखिरी दिन मेले के साथ मनाया जाना चाहिए।

अगली फसल के मौसम को भगवान से यह आशीर्वाद मिले।

स्थानीय देवता रक्षक हैं, वे हर गली-मोहल्ले में रहते हैं।

विश्वास के इस धागे से वे मन में गुंथे हुए हैं।

🗓� 🌾 🙌 🔱

7. मेला खत्म होने के बाद भी उत्साह बना रहता है।

पालकी का दिव्य रूप हमारी आंखों के सामने से न गुजरे।

हम अगले साल का सामना संतुलित जीवन के साथ करें।

हम दिन-रात अपने गांव के देवता की मधुर स्तुति गाएं।

🌃 🚩 ✨ 🕉�

कविता का छोटा मतलब
यह कविता 'लोकल मेले' के बारे में बताती है, जो महाराष्ट्र की ग्रामीण संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। पौष के महीने में, कई गांवों में गांव के देवता का मेला लगता है। पालकी की रस्म, गुलाल, हलगी की आवाज़, कुश्ती का अखाड़ा और जुलूस गांव में उत्साह का माहौल बनाते हैं। साल के आखिरी दिन अपने कुलदेवता या गांव के देवता की शरण लेकर नए साल की शुरुआत करना एक सुंदर लोक परंपरा है।

इमोजी समरी
🚩 (भगवा झंडा) • 🏘� (गांव/बस्ती) • 🥁 (ढोल/हलगी) • 🙏 (भक्ति) • 🚶�♂️ (पालखी समारोह) • 🎆 (उधलन) • 🕺 (डांस/लेज़िम) • 🎡 (पालना) • 🍭 (मिठाई) • 🐂 (बैलगाड़ी) • 🤼�♂️ (कुश्ती) • 🌾 (खेती-बाड़ी) • 🗓� (31 दिसंबर)

--अतुल परब
--दिनांक-31.12.2025-बुधवार.
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