“वर्तुल जीवन”, “पत्ते की यात्रा”

Started by dinesh.belsare, March 22, 2026, 08:17:26 AM

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dinesh.belsare

यह कविता एक टूटे हुए पत्ते के माध्यम से जीवन की यात्रा को दर्शाती है।
पत्ता अपने जन्म से लेकर अंत तक कई मौसमों और अनुभवों से गुजरता है।
अंत में वह हमें जीवन और मृत्यु के चक्र का गहरा संदेश देता है।

सुखकर टूटा हुआ पत्ता
ज़मीन पर गिरा आसमां से,
कभी हवा से खेलता, लहराता,
अब छूट गया अपनी गरिमा से।

जब आया होगा डाल पर,
नया होगा पूर्ण चेतन्य से,
खिलखिलाता बढ़ा होगा,
नाचता मग्न होकर रूप-संग से।

बारिश में होगा भीगा,
ठंड में कपकपाया होगा,
किरणों ने सींचा, झुलसाया,
रात में सोया, दिन में जगा होगा।

देखे उसने मौसम जाने कितने,
कभी नरम, कभी गरम,
हँसा होगा और रोया भी होगा,
नाचा झोंकों संग होकर बेशर्म।

आज ज़मीन पर गिरा है बेजान,
कुचला जाता हर कदम से,
सीखा गया जीवन-मृत्यु का खेल,
वर्तुल पूर्ण करना अंत आरंभ से।