अंत ही आरंभ है....

Started by dinesh.belsare, June 18, 2026, 06:54:43 PM

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dinesh.belsare

अंत ही आरंभ है
अंत ही आरंभ है,
आरंभ से ही तो अंत है।
अंत उसी का होता सदा,
जिसका कहीं आरंभ है॥

अस्ति...
वह "मैं" सदा था काल में,
आज में और कल में भी।
वह है सदा, हर काल में,
हर देश में भी, पल-पल में भी॥

जायते...
वह "मैं" से यह "मैं" आ गया,
गरिमा खोकर धूल पा गया।
इस "मैं" का ही यह जन्म है,
जो "मैं" और मुझसे छा गया॥

वर्धते...
बढ़ता जाता है हर ओर से,
बुद्धि, तन-मन, देह से।
कोष बना कर रेशम के,
गढ़ता चला, पर होके अस्तित्व से॥

विपरिणमते...
हर क्षण नया आकार लिया,
हर अनुभव ने ढाल दिया।
जो था कल, वह आज नहीं,
परिवर्तन ने सब बदल दिया॥

अपक्षीयते...
धीरे-धीरे क्षीण हुआ,
समय ने अपना काम किया।
जो अपना था, छूट चला,
अहं ने भी विश्राम लिया॥

विनश्यति...
मिट गया नाम, मिटा स्वरूप,
पंचतत्त्व में विलीन हुआ।
पर जो था साक्षी सदा से,
वह न जन्मा, न कभी नष्ट हुआ॥
— दिनेश बेलसरे 🌿