सोच के पार..

Started by dinesh.belsare, June 18, 2026, 06:57:49 PM

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dinesh.belsare

जब उतरता हूँ सोच की गहराई में,
सोच के पार जाने से घबराता हूँ।
फिर मैं कैसे जान पाऊँ,
पार क्या है और मैं कौन हूँ?

बार-बार ठोकरें खाकर,
अंधी गलियों में खो जाता हूँ।
फिर घोर तम से बाहर आता हूँ,
पर उजाला होने से ही डर जाता हूँ।

गिरने के कारण हज़ार हैं,
पर संभल फिर भी जाता हूँ।
कोशिशें चाहे कितनी कर लूँ,
द्वंद्व से ऊपर न उठ पाता हूँ।

प्रश्नों के इस अनंत वन में,
मैं स्वयं को खोजने निकलता हूँ।
हर उत्तर के द्वार पर जाकर,
एक नया प्रश्न ही पाता हूँ।

कभी लगता है पा लूँगा,
अपने होने का रहस्य कहीं।
फिर सोच के उसी भँवर में,
खो जाता हूँ मैं फिर यहीं।

— दिनेश बेलसरे