📜🖋️🏛️ क्रोध का मुरब्बा (वैर) 📜✨⚡ 🔥 💧 📜 🌩️ 🏺 🍯 🥒 🌪️ 💔 💡 🌸 🐍 🕯️

Started by Atul Kaviraje, July 25, 2026, 11:07:02 AM

Previous topic - Next topic

Atul Kaviraje

गुस्से का व्यवहार
कथन: "वैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।"
-आचार्य रामचंद्र शुक्ल-आलोचक, निबंधकार, इतिहासकार-हिंदी साहित्यिक आलोचना और इतिहास लेखन के पायनियर-
-निबंध: गुस्सा
-ओरिजिनल टेक्स्ट: चिंतामणि (पार्ट-1) (पहले का नाम: विखा-वीथी, 1930)
-पब्लिकेशन का साल: 1939 AD. (चिंतामणि के तौर पर)
-रेफरेंस: साइकोएनालिसिस।

प्रस्तावना (हिंदी) 📚✨
हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध मनोविकार संबंधी निबंध 'क्रोध' (ग्रंथ: चिंतामणि भाग-1, 1939 ई.; पूर्व नाम: विचार-वीथि, 1930 ई.) में क्रोध और वैर के संबंध का विश्लेषण करते हुए यह अत्यंत प्रसिद्ध एवं सटीक कथन कहा था: "वैर क्रोध का आचार या मुरब्बा है।" जैसे अचार या मुरब्बा किसी फल को लंबे समय तक सुरक्षित रखता है, वैसे ही वैर मनुष्य के मन में क्षणिक क्रोध को स्थायित्व प्रदान करता है। यह कविता इसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित है।

संदर्भ और घटना: आचार्य रामचंद्र शुक्ल | निबंध: क्रोध | ग्रंथ: चिंतामणि भाग-1 (प्रकाशन: 1939 ई., पूर्व नाम: विचार-वीथि, 1930 ई.) | संदर्भ: मनोविकार संबंधी विश्लेषण। 📜🖋�🏛�

क्रोध का मुरब्बा (वैर) 📜✨

पद १
क्षणिक संताप ही क्रोध का रूप है, ⚡
मन में उठती यह विपदा की धूप है। 🔥
समय के बहने से ठंडी हो जाए, 💧
पर वैर की गाथा अलग ही कहाए। 📜

पद अर्थ / भावार्थ: क्रोध एक क्षणिक आवेग है जो समय के साथ शांत हो जाता है, किंतु वैर की प्रकृति इससे भिन्न होती है।

⚡🔥💧📜🌩�

पद २
क्रोध को मन में जब रखें हम सहेज, 🏺
समय के साथ बने मुरब्बा यह तेज। 🍯
वैर तो है क्रोध का अचार ही भारी, 🥒
मन की यह शांति छीन लेता है सारी। 🌪�

पद अर्थ / भावार्थ: जब क्रोध को मन में संचित करके रखा जाता है, तो वह अचार या मुरब्बे की तरह पक्का होकर 'वैर' बन जाता है।

🏺🍯🥒🌪�💔

पद ३
शुक्ल जी ने दिया यह मानस का पाठ, 💡
मन के विकारों का खोला यह ठाठ। 🌸
क्षण का यह क्रोध जब वैर बन जाए, 🐍
इंसान को अंदर से धीरे-धीरे खाए। 🕯�

पद अर्थ / भावार्थ: आचार्य शुक्ल ने स्पष्ट किया कि स्थायी रूप धारण कर चुका क्रोध (वैर) मनुष्य को आंतरिक रूप से नष्ट कर देता है।

💡🌸🐍🕯�🧠

पद ४
अचार जैसे रखे फल का यह स्वाद, 🍇
वैर भी तो रखे जीवित पुराना विवाद। ⚔️
वर्षों-वर्ष तक यह बदले की आग, ⚡
मन में जगाए रखे दुख का यह राग। 🌧�

पद अर्थ / भावार्थ: जिस प्रकार अचार फल को सड़ने से बचाकर सुरक्षित रखता है, उसी प्रकार वैर प्रतिशोध की भावना को वर्षों तक जीवित रखता है।

🍇⚔️⚡🌧�🥀

पद ५
प्रतिशोध की अग्नि में जलता सब सुख, 🕯�
वैर की इस छाया में मिलता बस दुख। 🌧�
क्रोध को तो समय पर छोड़ ही देना, 🕊�
क्षमा के ही पथ पर कदम तुम रखना। 🌟

पद अर्थ / भावार्थ: वैर से केवल दुख मिलता है; अतः समय रहते क्रोध का त्याग कर क्षमा का मार्ग अपनाना ही बुद्धिमानी है।

🕯�🌧�🕊�🌟💖

पद ६
मन की स्वच्छता को रखें हम सदा, 🧼
वैर के इस अचार को फेंकें हम सदा। 🗑�
प्रेम की मिठास को दिल में बसाएँ, 🍯
सद्भाव का यह दीप घर-घर जलाएँ। 🪔

पद अर्थ / भावार्थ: मन से वैर और प्रतिशोध की भावना निकालकर प्रेम और सद्भाव का प्रकाश फैलाना चाहिए।

🧼🗑�🍯🪔✨

पद ७
साहित्य का यह ज्ञान मन में बसाएँ, 🌱
क्रोध की इस आग को प्रेम से बुझाएँ। 🌊
शुक्ल जी का यह पाठ सीखें हम सारे, 📜
जीवन में चमके फिर शांति के तारे। 🌕

पद अर्थ / भावार्थ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के इस मनोवैज्ञानिक विचार को अपनाकर हमें जीवन में शांति और सौहार्द स्थापित करना चाहिए।

🌱🌊📜🌕✨

इमोजी सारांश (Emoji Summary) 📊
⚡ 🔥 💧 📜 🌩� 🏺 🍯 🥒 🌪� 💔 💡 🌸 🐍 🕯� 🧠 🍇 ⚔️ ⚡ 🌧� 🥀 🕯� 🌧� 🕊� 🌟 💖 🧼 🗑� 🍯 🪔 ✨ 🌱 🌊 📜 🌕 ✨ (कुल ३५ इमोजी)

विशेष टिप्पणी (Footnote): 📝
यह कविता आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रसिद्ध निबंध 'क्रोध' में वर्णित मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है। संचित क्रोध ही वैर का रूप लेता है; अतः मानव कल्याण के लिए क्षमा और शांति का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है। 📚🕊�🤝🎓✨

--संकलन
--अतुल परब
--दिनांक-24.07.2026-शुक्रवार.
===========================================