कितने वर्ष बीत गए!⚖️ 📉 🧮 💭 💔 🚶‍♂️ 🎒 🥺 💧 🌾 👕 💦 😭 ⚖️ 👑 🏛️ 💸 😢 🌪️

Started by Atul Kaviraje, August 29, 2026, 08:19:06 PM

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Atul Kaviraje

कवि और कविता का परिचय (हिंदी प्रस्तावना)
आम जनता के मन में सुलगते असंतोष और राजनीतिक व्यवस्था के लापरवाह कामकाज को आवाज देने वाली यह एक तीव्र यथार्थवादी कविता है। जीवन का हिसाब लगाते समय होने वाली निराशा और सत्ता के खेल में पिसते आम आदमी के आक्रोश को इसमें प्रभावी रूप से दर्शाया गया है।
🪞📜✊🧠✨

शीर्षक: कितने वर्ष बीत गए!

कितने वर्ष बीत गए, कितने बचे हैं
इसी का गणित मन में लगा रहा हूँ
सुख की जोड़ कम, घटाव अधिक है,
गुणा कम, भाग ही कर रहा हूँ
अर्थ: जीवन कितना निकल गया और कितना बाकी है, इसका हिसाब लगाते समय सुख का संचय कम और दुखों का बोझ अधिक नजर आता है।
⏱️📉🧮💭💔

अपेक्षाओं का बोझ उठाकर चलते हैं
मन में आशा-आकांक्षाएँ पूरी होती देखते हैं
परंतु यह सब मन का ही खेल है
हृदय के भीतर सिसकियाँ उमड़ती हैं
अर्थ: जीवन में तमाम उम्मीदें पालकर आगे बढ़ने वाले इंसान के हिस्से में अंततः निराशा और दर्द ही आते हैं।
🚶�♂️🎒🥺💭💧

अन्न और वस्त्र के बिना दिन बीत जाते हैं
पसीना बहाकर और मेहनत करके लोग मर जाते हैं
रोटी का टुकड़ा भी किसी को नसीब नहीं होता
गरीबों के आँसू यहाँ तैरते नजर आते हैं
अर्थ: दिन-रात कठिन श्रम करने के बावजूद गरीबों को दो वक्त की रोटी और बुनियादी जरूरतें नहीं मिल पाती हैं।
🌾👕💦😭⚖️

सत्ता के सिंहासन पर जो लोग बैठे हैं
वे जनता की आँखों में आँसू भर देते हैं
कुर्सियों की भाषा उन्हें समझ नहीं आती
हर घर में आज यह कैसा शोक पसरा है
अर्थ: सत्ता के नशे में चूर शासकों को जनता के आंसुओं और उनकी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है।
👑🏛�💸😢🌪�

वचनों के सारे खेल झूठे साबित हुए
निसार भाग्य के छाले शरीर पर बचे हैं
हर कदम पर विश्वासघात हुआ है
आशा के दीये अब मानो बुझ चुके हैं
अर्थ: नेताओं के सारे वादे और दावे झूठे साबित हुए हैं, जिससे जनता का विश्वास पूरी तरह टूट चुका है।
📜🤥👣🔥🌑

यहाँ आरोपों की झड़ी लगती रहती है
आम इंसान पिस-पिसकर मरता रहता है
न्याय की गुहार किससे लगाई जाए
अन्याय की ताकत यहाँ बढ़ती जा रही है
अर्थ: कुर्सी की लड़ाई में चल रहे आरोपों के दौर में आम जनता निरंतर पिसती जा रही है।
🎯🗣�⚖️⛓️⚠️

अब तो जाग जाओ हे जनप्रतिनिधि राजा
क्या गरीबों के द्वार पर कभी रहम आएगा
आँसू की भाषा अब तो समझ लो
जब यह आक्रोश भड़केगा तो भूकंप आएगा
अर्थ: जनता का यह दबा हुआ रोष यदि भड़क उठा, तो व्यवस्था की नींव हिलाकर रख देगा।
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कविता का सारांश
जीवन के संघर्षों और सत्ता की उदासीनता के बीच सुलगता यह जन-आक्रोश एक बड़े बदलाव की चेतावनी देता है।
🎯⚖️🔥✊🇮🇳

हिंदी तलटीप (Foot-note):
यह कविता शोषित समाज की गहरी पीड़ा और शासकों की उदासीनता पर लिखा गया एक ज्वलंत दस्तावेज है।
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--संकलन --अतुल परब--दिनांक-29.08.2026-शनिवार.
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