नया दुःख-कोश!📖 🚫 💧 🖋️ 🥀 🚶‍♂️ 🎒 🥺 💭 💧 🌾 👕 💦 😭 ⚖️ 👑 🏛️ 💸 😢 🌪️

Started by Atul Kaviraje, August 29, 2026, 08:19:48 PM

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Atul Kaviraje

कवि और कविता का परिचय (हिंदी प्रस्तावना)
आम आदमी के जीवन के दुखों की गहराई और व्यवस्था की उदासीनता के कारण पैदा हुए खालीपन पर प्रकाश डालने वाली यह एक अत्यंत भावुक कविता है। शब्दकोश से सुख का शब्द मानो गायब हो चुका है और जीवन के हर पन्ने पर केवल दुखों का साया है, इसका यथार्थवादी चित्रण इसमें किया गया है।
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शीर्षक: नया दुःख-कोश!

सुख यह शब्द शब्द-कोश से
मेरे कब का नामोनिशान मिट चुका है
पन्ना-पन्ना मेरे दुखों से भर गया है
मैंने एक नया दुःख-कोश लिख डाला है
अर्थ: मेरे जीवन की किताब से 'सुख' शब्द बहुत पहले गायब हो चुका है, और हर पन्ने पर दुःख होने के कारण मैंने दुखों का एक नया ग्रंथ ही रच दिया है।
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अपेक्षाओं का बोझ उठाकर चलते हैं
मन में आशा-आकांक्षाएँ पूरी होती देखते हैं
परंतु यह सब मन का ही खेल है
हृदय के भीतर सिसकियाँ उमड़ती हैं
अर्थ: जीवन में तमाम उम्मीदें पालकर आगे बढ़ने वाले इंसान के हिस्से में अंततः निराशा और दर्द ही आते हैं।
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अन्न और वस्त्र के बिना दिन बीत जाते हैं
पसीना बहाकर और मेहनत करके लोग मर जाते हैं
रोटी का टुकड़ा भी किसी को नसीब नहीं होता
गरीबों के आँसू यहाँ तैरते नजर आते हैं
अर्थ: दिन-रात कठिन श्रम करने के बावजूद गरीबों को दो वक्त की रोटी और बुनियादी जरूरतें नहीं मिल पाती हैं।
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सत्ता के सिंहासन पर जो लोग बैठे हैं
वे जनता की आँखों में आँसू भर देते हैं
कुर्सियों की भाषा उन्हें समझ नहीं आती
हर घर में आज यह कैसा शोक पसरा है
अर्थ: सत्ता के नशे में चूर शासकों को जनता के आंसुओं और उनकी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है।
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वचनों के सारे खेल झूठे साबित हुए
निसार भाग्य के छाले शरीर पर बचे हैं
हर कदम पर विश्वासघात हुआ है
आशा के दीये अब मानो बुझ चुके हैं
अर्थ: नेताओं के सारे वादे और दावे झूठे साबित हुए हैं, जिससे जनता का विश्वास पूरी तरह टूट चुका है।
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यहाँ आरोपों की झड़ी लगती रहती है
आम इंसान पिस-पिसकर मरता रहता है
न्याय की गुहार किससे लगाई जाए
अन्याय की ताकत यहाँ बढ़ती जा रही है
अर्थ: कुर्सी की लड़ाई में चल रहे आरोपों के दौर में आम जनता निरंतर पिसती जा रही है।
🎯🗣�⚖️⛓️⚠️

अब तो जाग जाओ हे जनप्रतिनिधि राजा
क्या गरीबों के द्वार पर कभी रहम आएगा
आँसू की भाषा अब तो समझ लो
जब यह आक्रोश भड़केगा तो भूकंप आएगा
अर्थ: जनता का यह दबा हुआ रोष यदि भड़क उठा, तो व्यवस्था की नींव हिलाकर रख देगा।
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कविता का सारांश
सुख की तलाश में दुखों का पहाड़ झेलती जनता का यह आक्रोश अंततः व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लाने की चेतावनी देता है।
🎯⚖️🔥✊🇮🇳

हिंदी तलटीप (Foot-note):
यह कविता हँसना भूल चुके और दुखों का बोझ ढोने वाले शोषित समाज की असीम पीड़ा का ज्वलंत प्रतीक है।
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--संकलन --अतुल परब--दिनांक-29.08.2026-शनिवार.
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