अब भोजनालय और होटलों की शान बन चुका मोदक 🏨🍽️🏠💔📉🏨 🍽️ 🏠 💔 📉 💸 🏪 🍲 🚫

Started by Atul Kaviraje, September 03, 2026, 11:06:48 AM

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Atul Kaviraje

अब भोजनालय और होटलों की शान बन चुका मोदक 🏨🍽�🏠💔📉

भोजनालय की थाली में आज इसका पक्का स्थान है,
बड़े-बड़े होटलों में भी आज इसका ही मान है।
घर की वह चौखट और माँ का आँचल छोड़ आया है,
बाजार की इस चकाचौंध में यह मोदक खोया है।
अर्थ: घर की चौखट छोड़कर मोदक अब होटलों और भोजनालयों की शान बन गया है।
🏨🍽�🏠💔📉

आज वह अपना प्यारा घर पूरी तरह से भूल गया है,
होटलों की उस दुनिया में मुग्ध होकर झूल गया है।
माँ के हाथों का वह जादू अब कहीं नजर नहीं आता,
व्यापार के इस चक्रव्यूह में वह अकेला ही खो जाता।
अर्थ: मोदक अपना घरपण भूलकर व्यावसायिक दुनिया में पूरी तरह रम गया है।
💸🏪🍲🚫🏠

आज मोदक घरपण भूल बैठा है, यह कैसी है कहानी,
दुकान के उस डिब्बे को ताकती है मेरी आँखों की पानी।
कहाँ गया वह अपनापन और कहाँ गई वे प्रेम की बातें,
अब तो बस पैसों से तौली जाती हैं सारी रातें।
अर्थ: मोदक का घरपण अब खो गया है और सब कुछ पैसों से तौला जाने लगा है।
📦💵📉🥺💔

काँच के उन डिब्बों में सजकर वह जब आ जाता है,
घर की उन मीठी यादों को मन में ताजा कर जाता है।
दुकान की उस शेल्फ पर वह शान से है मुस्कुराता,
पर घर की उस गर्माहट के लिए वह अंदर से है पछताता।
अर्थ: होटलों की कांच की अलमारी में सजा मोदक घर की गर्माहट को तरसता है।
🪟🍰🏷�😔💧

बाप्पा भी कैसे स्वीकारेंगे यह बाजार का लाया भोग,
जहाँ न तो माँ का पसीना है और न ही कोई संयोग।
फिर भी भक्तों के भाव को वे मान लेते हैं अपना,
पर घर के बने मोदक का खो गया है वह सपना।
अर्थ: बाजार के मोदक में प्रेम नहीं होता, फिर भी बाप्पा भक्तों के भाव के कारण इसे स्वीकारते हैं।
🐘🙏💖🎁🥺

इतिहास के पन्ने हमें ज्ञान यह सिखलाते हैं,
चीजों के व्यावसायिकरण से हम अपनापन गंवाते हैं।
अखंड भारत का हो सदा ही पावन जयजयकार,
घर के संस्कारों का प्यार रहे सदा
अर्थ: व्यावसायिकता के चक्कर में हम अपनापन गंवाते जा रहे हैं, यही इतिहास का सत्य है।
🧠📖🙏🌿🌐

अखंड भारत का हो सदा ही पावन जयजयकार,
मोदक का वह घरपण लौटे फिर से इस संसार।
माँ के हाथों की वह मिठास घर-घर में महकती रहे,
खुशियों की यह सरगम सदा दिलों में चहकती रहे।
अर्थ: अखंड भारत का जयजयकार हो और मोदक का पुराना घरपण हर घर में फिर से लौटे।
📢🚩😊🌿🎉

हिंदी कविता टिपटिप: मोदक का घर से निकलकर होटलों और बाजारों तक सीमित हो जाना हमारे बदलते सामाजिक मूल्यों का एक आईना है। 🥟🏨📉

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--संकलन --अतुल परब--दिनांक-०३.०९.2026-गुरुवार.
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