ईश्वर के प्रति विरह और अगाध प्रेम👁️ 🛤️ 💧 🤲 ⏳ | 💧 🥣 👁️ ✨ 🕊️ | 🎶 🎻 💓 🌌

Started by Atul Kaviraje, September 11, 2026, 02:37:47 PM

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Atul Kaviraje

कवि और साखी का परिचय (हिंदी)
संत कबीरदास भक्ति काल के महान संत और समाज सुधारक कवि थे। उनकी साखियाँ जीवन के गहरे सत्यों और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाती हैं। यह साखी उनके प्रसिद्ध 'बिरह का अंग' से ली गई है, जिसमें जीवात्मा की परमात्मा के प्रति तड़प का अनोखा वर्णन है।

साखी का शीर्षक: ईश्वर के प्रति विरह और अगाध प्रेम

कडवे १
राह निहारते-निहारते आँखें थक गई सारी,
तेरी ही प्रतीक्षा में बीती उमर हमारी।
नाम पुकार-पुकारकर जीभ पर छाले पड़े,
तेरे दीदार के खातिर हम हरदम यहाँ खड़े।
भावार्थ: ईश्वर का मार्ग जोहते-जोहते आँखें थक गई हैं और नाम पुकारते-पुकारते मुँह में छाले पड़ गए हैं, परंतु प्रेम कम नहीं हुआ।
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कडवे २
दोनों नैन बने वैरागी, विरह कमंडल धारे,
दर्श की भीख माँगते दिन-रैयन हमारे।
मधुकरी पाकर प्रभु की तृप्त रहता मन मेरा,
तेरे ही प्रकाश से जगमग है यह डेरा।
भावार्थ: साधक के दोनों नेत्र वैरागी बनकर केवल प्रभु के दर्शन रूपी भिक्षा की कामना करते हैं।
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कडवे ३
तन की हर एक नस जैसे रबाब की है तांती,
विरह की धुन बजाकर जो मन को है भाती।
इस अनहद नाद को कोई और न सुन पाता,
साँइ के चित्त से बस यह नाता जुड़ जाता।
भावार्थ: शरीर रूपी वाद्य पर विरह की स्वरलहरी बजती है, जिसे केवल प्रेमी भक्त और परमात्मा ही समझ सकते हैं।
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इमोजी सारांश (हिंदी):
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साखी संदर्भ टीप (हिंदी):
यह साखी साधक के हृदय की उस तड़प को दर्शाती है जहाँ भगवान के बिना जीवन अधूरा और व्याकुल रहता है।

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--संकलन --अतुल परब--DATE-10.09.2026-THURSDAY.
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